
जयनगर। अनुमंडल मुख्यालय के जिला परिषद बाजार स्थित ब्रिटिशकालीन डाक बंगला पिछले करीब 20 वर्षों से बदहाली की मार झेल रहा है। वर्ष 1940 में ब्रिटिश शासन के दौरान निर्मित यह भवन कभी क्षेत्र की राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र हुआ करता था, लेकिन आज इसकी हालत इतनी जर्जर हो चुकी है कि भवन स्वयं अपने संरक्षण की मांग करता नजर आता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार यह डाक बंगला केवल एक पुरानी इमारत नहीं, बल्कि जयनगर के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक दौर था जब यहां बड़े नेताओं का आना-जाना लगा रहता था। कई महत्वपूर्ण राजनीतिक बैठकों और चर्चाओं का गवाह रहे इस भवन में कभी क्षेत्र के राजनीतिक समीकरण तय होते थे।
बताया जाता है कि स्वतंत्रता से पहले और बाद के शुरुआती वर्षों में यह डाक बंगला प्रशासनिक अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक नेताओं के ठहरने की प्रमुख जगहों में शामिल था। क्षेत्र में आने वाले वरिष्ठ अधिकारी और नेता अक्सर यहीं रुकते थे।
समय के साथ इसकी उपयोगिता कम होती गई और रखरखाव के अभाव में भवन धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होता चला गया। अब स्थिति यह है कि भवन की दीवारें, छत और अन्य हिस्से जर्जर हो चुके हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इसकी मरम्मत और संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में यह ऐतिहासिक संरचना पूरी तरह नष्ट हो सकती है।
डाक बंगले की वर्तमान स्थिति को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। पूर्व में कई जिला परिषद अध्यक्ष और उप विकास आयुक्त यहां पहुंचकर भवन का निरीक्षण कर चुके हैं, लेकिन इसके जीर्णोद्धार की दिशा में कोई ठोस पहल सामने नहीं आई।
निरीक्षण के दौरान कई बार भवन की मरम्मत, साफ-सफाई और संरक्षण की बात कही गई, लेकिन योजनाएं कागजों से आगे नहीं बढ़ सकीं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से सिर्फ निरीक्षण होते रहे, लेकिन वास्तविक काम शुरू नहीं हुआ। इसी कारण डाक बंगले की हालत लगातार खराब होती गई।
भवन के कई हिस्सों में टूट-फूट दिखाई देती है। लंबे समय से रखरखाव नहीं होने के कारण परिसर भी उपेक्षा का शिकार है।
ऐतिहासिक भवन होने के बावजूद इसके संरक्षण के लिए कोई नियमित योजना नहीं बनाई गई। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि इसका जीर्णोद्धार किया जाए तो इसे जयनगर की ऐतिहासिक पहचान के रूप में विकसित किया जा सकता है।
डाक बंगले का निर्माण 1940 में हुआ था। उस समय ऐसे भवनों का उपयोग सरकारी अधिकारियों और यात्रियों के ठहरने के लिए किया जाता था।
जयनगर का यह डाक बंगला अपने समय में प्रशासनिक गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा। आसपास के क्षेत्रों से आने वाले अधिकारियों की बैठकें और कार्यक्रम यहां आयोजित होते थे।
राजनीतिक दृष्टि से भी इसकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है। पुराने लोगों का कहना है कि एक समय इस भवन में होने वाली बैठकों पर पूरे क्षेत्र की नजर रहती थी।
कई नेताओं के राजनीतिक भविष्य से जुड़े निर्णय भी इसी परिसर में लिए जाते थे। यही कारण है कि स्थानीय लोग इसे केवल सरकारी भवन नहीं बल्कि ऐतिहासिक धरोहर मानते हैं।
अब इस धरोहर को बचाने की मांग लगातार उठ रही है। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रशासन को इसके संरक्षण के लिए विशेष योजना बनानी चाहिए।
जीर्णोद्धार के बाद भवन को सरकारी अतिथि गृह, सांस्कृतिक केंद्र या ऐतिहासिक स्मारक के रूप में विकसित किया जा सकता है।
यदि भवन की मूल संरचना को सुरक्षित रखते हुए उसकी मरम्मत की जाए तो यह आने वाली पीढ़ियों को क्षेत्र के इतिहास से परिचित करा सकता है।
स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि जयनगर जैसे सीमावर्ती और ऐतिहासिक महत्व वाले क्षेत्र में पुराने सरकारी भवनों का संरक्षण जरूरी है।
ऐसे भवन शहर की पहचान और विरासत से जुड़े होते हैं। इन्हें खत्म होने देना इतिहास के एक हिस्से को खो देने जैसा होगा।
डाक बंगले की बदहाल स्थिति प्रशासनिक उदासीनता पर भी सवाल खड़े करती है। बीते वर्षों में कई अधिकारी यहां आए, लेकिन किसी स्तर पर काम शुरू नहीं हो सका।
लोगों का कहना है कि केवल निरीक्षण करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए बजट, तकनीकी सर्वे और समयबद्ध कार्ययोजना तैयार करनी होगी।
भवन की वर्तमान स्थिति को देखते हुए पहले इसकी संरचनात्मक मजबूती की जांच जरूरी मानी जा रही है। इसके बाद संरक्षण विशेषज्ञों की सलाह से मरम्मत का काम किया जा सकता है।
यदि भवन के पुराने स्वरूप को सुरक्षित रखते हुए जीर्णोद्धार किया जाए तो यह पर्यटन की दृष्टि से भी आकर्षण का केंद्र बन सकता है।
जयनगर आने वाले लोग इस ऐतिहासिक भवन को देख सकेंगे और क्षेत्र के पुराने राजनीतिक तथा प्रशासनिक इतिहास से परिचित हो सकेंगे।
स्थानीय स्तर पर यह मांग भी उठ रही है कि जिला परिषद भवन के संरक्षण के लिए अलग से प्रस्ताव तैयार करे और आवश्यक राशि की व्यवस्था करे।
लोगों का कहना है कि इतने वर्षों से उपेक्षित पड़े भवन पर अब तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।
बारिश और मौसम की मार से भवन की हालत और खराब होने की आशंका बनी रहती है। कई हिस्सों में क्षति लगातार बढ़ रही है।
यदि समय रहते मरम्मत नहीं की गई तो भविष्य में जीर्णोद्धार की लागत भी बढ़ सकती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिला प्रशासन और जिला परिषद को संयुक्त रूप से इस दिशा में काम करना चाहिए।
1940 में निर्मित यह डाक बंगला करीब आठ दशक पुराने इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए है। इसके बावजूद पिछले दो दशकों से इसकी उपेक्षा ने इसकी पहचान को धूमिल कर दिया है।
फिलहाल जयनगर का यह ब्रिटिशकालीन डाक बंगला जीर्णोद्धार की उम्मीद में खड़ा है। लोगों की मांग है कि सरकार और प्रशासन इसे बचाने के लिए जल्द ठोस कदम उठाएं, ताकि यह ऐतिहासिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रह सके।





